न हार में न जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं, बिग बी की निजी जिंदगी भी प्रेरणा से भरी है

सदी के महानायक के 75वें जन्मदिन पर विशेष

मुंबईः न हार में न जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं। ये पंक्तियां अमिताभ बच्चन पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। पर्दे पर एक बेमिसाल अभिनेता के मोहपाश में खुद को बंधा हुआ महसूस करने से अलग हम अमिताभ बच्चन की निजी जिंदगी के कई किस्सों से सबक ले सकते हैं। सदी का महानायक आज अपना 75वां जन्मदिन मना रहे हैं। राष्टृपति, प्रधानमंत्री और तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्री उन्हें जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं। 

उनका जीवन भी प्रेरणा युक्त

एक वाकया 1982 का है जब कुली फिल्म की शूटिंग में गंभीर तौर पर जख्मी होने के बाद भी उन्होंने करोड़ों दर्शकों की दुआओं और अपने हौसले के बूते दोबारा से कामयाबी की नई बुलंदियां छुईं। और दूसरी नब्बे के दशक में एक कामयाब पारी के बाद दिवालिया होने तक की नौबत आने के बाद भी खुद को टूटने नहीं दिया। एक बार अपनेआप को फिर से समेटकर उठ खड़े हुए।
अमिताभ बच्चन ने उस बुरे दौर को याद करते हुए एक बार कहा था, ‘साल 2000 में जहां पूरी दुनिया नई शताब्दी के जश्न में डूबी थी, मैं अपने दुर्भाग्य में फंसा था। मेरे पास फिल्म नहीं थी, पैसे नहीं थे, कोई दोस्त नहीं था, मैं कानूनी मामलों से घिरा था और टैक्स डिपार्टमेंट वाले मेरे घर की नीलामी के कागजात लेकर दरवाजे पर खड़े थे।’
साल 2000 में अमिताभ बच्चन की उम्र 57 साल की थी। इस उम्र में आमतौर पर लोग अपना रिटायरमेंट प्लान कर रहे होते हैं। लेकिन अमिताभ जिंदगी के इस नाजुक मोड़ पर खुद को दोबारा खड़ा करने की कोशिश में लगे थे। वो अपनी फायनेंसियल स्थिति को मजबूत करने में लगे थे, अपने ऊपर पड़े करोड़ों के कर्ज को निपटाने में लगे थे।

कर्मचारियों की सैलरी तक देने के पैसे नहीं

फिल्म इंडस्ट्री में तीन दशक की कामयाब पारी के बाद 1995 में बिगबी ने अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी एबीसीएल नाम से फिल्म प्रोडक्शन और इवेंट मैनेजमेंट की कंपनी बनाई थी। पहले साल इसने 65 करोड़ का करोबार किया, जिसमें कंपनी को 15 करोड़ का शुद्ध मुनाफा हुआ। लेकिन दूसरे ही साल से कंपनी की वित्तीय स्थिति बिगड़ती गई। 
1996 में एबीसीएल ने बेंगलुरु में मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता का आयोजन करवाया। इसके आयोजन में कंपनी को जबरदस्त घाटा हुआ। इसके बाद फिल्म निर्माण से लेकर उसकी मार्केटिंग, संगीत के राइट्स जैसे हर धंधे में कंपनी को नुकसान उठाना पड़ा। 1999 आते-आते कंपनी बुरी तरह से वित्तीय संकट में फंस गई। अमिताभ बच्चन की कंपनी के पास अपने कर्मचारियों की सैलरी तक देने के पैसे नहीं थे।

अर्श से फर्श तक का सफर

अमिताभ बच्चन अर्श का सफर तय करके दोबारा फर्श पर आ चुके थे। लेकिन उनमें नियती से लड़ने का हौसला बरकरार था। इंडियन बोर्ड ऑफ इंड्रस्ट्रियल फायनेंसियल रिकंस्ट्र्क्शन ने अमिताभ की कंपनी एबीसीएल को दिवालिया करार दे दिया। इस बुरे वक्त में सहारा इंडिया के मुखिया सुब्रतो राय और उस वक्त समाजवादी नेता रहे अमर सिंह ने उनकी मदद को आगे आए। अमिताभ बच्चन ने सहारा इंडिया फायनेंस को अपना बंगला गिरवी रखकर कर्ज की रकम का इंतजाम किया।
अमिताभ बच्चन के पास फिल्में नहीं थी। कोई उन्हें नई फिल्म देने को तैयार नहीं था। स्टारडम एक झटके में खत्म हो चुका था। ऐसे मौके पर यश चोपड़ा ने उन पर भरोसा जताया और अपनी फिल्म मोहब्बतें में उन्हें रोल ऑफर किया।

यश चोपड़ा ने की मदद

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अमिताभ बच्चन ने कभी कहा था, ‘उन दिनों हर वक्त मेरे सिर पर तलवार झूलती रहती थी। मैंने कई रातें जागकर बिताईं। एक सुबह मैं उठा और सीधे यश चोपड़ा के पास चला गया। मैंने उनसे कहा कि मैं दिवालिया हो चुका हूं। मेरे पास फिल्म नहीं है। मेरा घर और दिल्ली की कुछ प्रॉपर्टीज अटैच हो चुकी है। यशजी ने मेरी पूरी बात शांत होकर सुनी और अपनी फिल्म मोहब्बतें में एक रोल ऑफर किया। इसके बाद मैंने कुछ कर्मशियल एड, टेलीविजन शो और फिल्में करनी शुरू की। मैंने 90 करोड़ रुपए के कुल कर्ज को चुकता किया और एक बार फिर से नई शुरुआत की।’

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