चुनौतियों का सामना करने के लिए मानव को तैयार रहे

हरीओम वर्मा (राजेश)

गिरिडीह 13 सितंबर :
इन दिनों गिरिडीह जिले के कई प्रखंड़ो के किसानों के चेहरे की हवाइयाँ उड़ रही है। पिछले कई दिनों से बारिश की बूँदें नहीं गिरने के कारण किसान परेशान हो गये है। उनके द्वारा सावन में की गई कठिन मेहनत पर इस बार पानी फिरता नजर आ रहा है। आगे कुछ दिन यही हाल बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब किसानों के चेहरे पर मायूसी और पछताने के अलावे कोई चारा नहीं बचेगा।

कभी कभी कुछ क्षेत्रों में छिटपुट बारिश की सूचना मिलती तो है पर जिस तरह से धान के फसल को इस समय बारिश या पानी चाहिए, वैसी बारिश की खबर किसी भी इलाके से नहीं आई है। किसान यथासंभव अपने अपने फसल को बचाने का चेष्टा कर रहे है । जैसे भी हो रहा है।

कुंआ, नदी, नाला, तलाब, पोखर और अन्य जलीय जगह से वैज्ञानिक तौर तरिकों को अपनाकर अपने धान का पटवान कर बचाने का प्रयास कर रहे है। ताकि अगर आगे बारिश हो तो बचे फसल से कुछ पैदावार की उम्मीद हो। कई जगह तो छोटी-मोटी नदीयों, तलाबो, डोभों ने बारिश के नादारत स्थिति और पटावन में तेजी होने के वजह से जवाब देना शुरू कर दिया है। जिससे किसान और भी परेशान हो गये है।

किसान के आंखो के सामने से उनका भविष्य और अच्छे पैदावार की उम्मीद उजड़ता दिख रहा है। मानसूनी फसलों के राजा धान के बेहतर पैदावार के लिए यह महीन बहुत ही अहम है। इसी माह में धान अपने जीवन चक्र के अहम दौर से गुजरता है। यही वक्त होता है, जब धान की बालियां निकलनी शुरू हो जाती है और धान में धान का बीज(फल) लगता है। इस अवधि के दौरान धान के पौधे को कम से कम 20 से.मी. से 40 सेमी. तक की पानी का स्तर जड़ो को चाहिए होता है। खेत को दो स्तर टांड़ तथा दोन दोनों का हालात खराब है। टांड स्तर के खेतों में तो दरार तक आ गया है। जबकि दोन स्तर के खेत से भी अब पानी निकलना बंद हो गया है।

फसलों के बर्बादी के साथ किसानों के बुरे दिन का प्रभाव शुरू हो गया है। झारखंड की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और ऐसे में झारखंड के प्रमुख खाद्य फसलों में से धान प्रमुख है। जिसकी उपज झारखंड में पूर्णतः मानसून पर अधारित है।
                                                 यानि किसान हर साल जुआ खेलते है। अब आगे आने वाले दिनों में देखना है, किसान इस जुआ में जीतते है या हराते है। जब भी कभी मानसून दगा देता है। किसानों के हाथों में साल भर के लिए पुनः नई लकीर खींच जाती है। व्यवस्थाओं के अभाव और कमजोर आर्थिक हालात के कारण किसान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता है। आंखों के सामने से उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है।
                                                            अब आगे पढ़िए जब मौसम का दंश किसानों पर पड़ता है तो कितना कुछ फर्क पड़ता है। झारखंड की कुल क्रियाशील जनसंख्या का लगभग 75% भाग कृषि कार्यों में संलग्न है। इन सब में अगर सिंचाई की बात की जाय तो अंदाजा लगाइए हम कितने पिछड़े है। मात्र लगभग 11% कृषि योग्य भूमि पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। झारखंड में खाद्य फसलों का उत्पादन 95% है, जबकि अखाद्य फसलों का हिस्सा सिर्फ 05% है। जिसमें चावल (धान )की प्रधानता है। इतना ही नहीं झारखंड में 46 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न की आवश्यकता है, जबकि उत्पादन लगभग 22 लाख मीट्रिक टन होता है। पहले से अधिक खपत का आंकडा और कम पैदावर।खेती के प्रति लोगों का गिरता रूझान आगे के दिनों में मुख्य समस्या के तौर पर उभरने के अनुमान है। इस समय भदाई फसल का समय है। जिसके अंतर्गत कई फसल आते है।जिनमें धान,मक्का,मंडुआ, गोंदली, उड़द, मूंग, कोदो,तिल आदि।कुछ को छोड़कर सबों पर बारिश की अल्पता ने अपना असर दिखाया है।अनुमति उपज को प्रभावित किया है। राज्य की कुल कृषि भूमि का लगभग 11% भाग सिंचित है।इनमें कुल सिंचित भूमि का 58.3 % भाग सतही जल द्वारा एवं 41.7% भाग भूमिगत जल द्वारा सिंचित है।झारखंड के कुल सिंचित क्षेत्र के 29.5% भाग पर कुंआ से सिंचाई की जाती है। जिसमें गुमला आगे है।यहाँ सर्वाधिक 87.2 % भाग पर कुंआ द्वारा सिंचाई की जाती है। कृषि प्रधान राज्य को अगर मानसूनी कृषि के अलावे जल्द ही विकल्प नहीं ढूँढा गया तो जल्द ही किसान खेती बारी से अपना हाथ खींचते नजर आएंगे क्योंकि पर्यावरण प्रदुषण वातावरण को इतना प्रभावित कर चुका है। जिसके परिणाम स्वरूप अल्पवृष्टि, सूखा व बाढ़ जैसे कई प्रकार के भयंकर आपदाओं का सामना अब मानव को करना पड़ रहा है। ऊपरी आपदाओं को झेलने और देखने के बाद भी समय रहते अगर नहीं आने वाले दिनों में सतर्कता का साथ नहीं संभाल गया तो भौम जल की कमी जैसे कई अन्य प्रकार चुनौतियों का सामना करने के लिए मानव को तैयार रहना पड़ेगा।