सिन्धु और गंगा की गिनती धरती की उन दस नदियों में हो रही है जो सबसे ज्यादा खतरे में हैं-

डिस्कवरी टाइम्स  : विन्सेंट डिसूज़ा 

नवी मुंबई :  भारत की नदियाँ – पेड़ लगाकर इन्हें बचाया जा सकता है नदियों में सिर्फ पानी नहीं बहता है, उनमें हमारा जीवन बहता है – इसी बात की चर्चा करते हुए आज के स्पॉट में सद्‌गुरु बता रहे हैं कि आखिर हम क्या कर सकते हैं इन जीवन-वाहिनी नदियों को बचाने के लिए अगर आप मुझसे पूछें कि मेरे लिए नदियों के क्या मायने हैं – तो मेरे लिए वे भारतीय सभ्यता का मूल हैं। सिन्धु, सतलुज और प्राचीन सरस्वती नदी के किनारे ही ये सभ्यता विकसित हुई। और दक्षिण में ये सभ्यता, कृष्णा, कावेरी, और गोदावरी के आस पास विकसित हुई। इन नदियों ने और इस भूमि ने सदियों से हमारा पालन-पोषण किया है। लेकिन पिछली दो पीढ़ियों से हम इसे रेगिस्तान में तब्दील कर रहे हैं।

अगर आप भारत के ऊपर से हवाई यात्रा करते हैं, तो आपको कम हरियाली दिखाई देगी, ज्यादातर सूखी जमीन ही दिखेगी। पिछले कुछ दशकों में हमारी नदियों के जल-स्तर में तेजी से गिरावट आई है। सिन्धु और गंगा की गिनती धरती की उन दस नदियों में हो रही है जो सबसे ज्यादा खतरे में हैं। मेरे बचपन के दिनों में कावेरी जैसी थी, वह भी अब सिर्फ चालीस फीसदी ही बची है। उज्जैन में पिछले कुम्भ मेले के लिए उन्हें नर्मदा नदी से पानी को पम्प करके एक कृत्रिम नदी बनानी पड़ी – क्योंकि क्षिप्रा नदी में पानी ही नहीं था। नदियां और झरने सूख गए हैं। पिछले कुछ सालों में भूमिगत जल का स्तर जबरदस्त तेज़ी से नीचे गिरा है। कई जगहों में पीने के पानी की कमी हो गयी है। हमें अपनी सोच को नदियों के दोहन से बदलकर उन्हें जीवंत बनाने में लगाना होगा। हमें देश में सभी को इस बारे में जागरूक करना होगा कि नदियों को बचाने की जबरदस्त जरुरत है। “अब तक, हर राज्य इस तरह से बर्ताव कर रहे हैं, जैसे कि वो अपने आप में एक अलग अस्तित्व हों। हमारी जरुरत ये है कि सभी राज्य एकजुट होकर एक ऐसी नीति तैयार करें जो सभी पर लागू हो।” हम एक रैली की तैयारी कर रहे हैं जो सोलह राज्यों से गुजरेगी। प्लान के अनुसार ये रैली तमिल नाडू के कन्याकुमारी से शुरू होगी, उत्तराखंड तक जाएगी फिर दिल्ली में आकर ख़त्म होगी। जिन सोलह राज्यों की राजधानियों से हम गुजरेंगे, उन जगहों पर बड़े समारोह आयोजित करेंगे, जिससे बड़े स्तर पर नदियों को बचाने के बारे में जागरूकता पैदा की जा सके। हमारी जरुरत ये है कि सभी राज्य एकजुट होकर एक ऐसी नीति तैयार करें जो सभी पर लागू हो।

केंद्र ने एक ऐसा बिल तैयार किया है, जिससे राज्यों के बीच पानी से जुड़ी समस्याओं के लिए एक ट्रिब्यूनल होगा। इस बिल से मदद मिल सकती है। एक बार नीति तैयार हो जाए, तो इसे पूरी तरह से लागू करने में थोड़ा समय लगेगा। पेड़ को काटने का काम एक दिन में हो सकता है। उसे उगाने के लिए कई दिन लगते हैं। समीकरण बहुत सरल है। नदियों के आस-पास पेड़ होने चाहिए। अगर हम पेड़ लगाएंगे, तो वे पानी को थाम कर रखेंगे, और इससे नदियाँ पोषित होंगी। अगर हम ये जागरूकता पूरे देश में फैलाएं, और एक सभी पर लागू होने वाली नीति बनाकर उसे लागू करना शुरू कर दें – तो ये हमारे देश के भविष्य और आने वाली पीढ़ियों की खुशहाली के लिए एक जबरदस्त और सफल कदम होगा।

# हमारी नदियों को बचाने के लिए वोट दें। 80009 80009 पर मिस्ड कॉल दें।